पंखुड़ी

रंग सुरों के साथ, क्षितिज के पार

Tuesday, August 15, 2006

पल ........

पारदर्शी पल,
नटखट बच्चो से .............
हाथ छुडा दौडते चले गये ,
मै !
बेबस देखती रही !
फूलो को छूते ही ..............
रंगों से नहाये ,
सूरज के इर्द गिर्द मन्डराये,
गमों में मेरे

पत्थर से भारी ............
खुशियों मे मेरी ,
मलमल के आंचल से लहराये !!
मैं ...........
अचरज से सोचती रही !!!!
पल
पारदर्शी पल !!
पल जुडॆ ,
युग बने ,
सारे ब्रहमान्ड में समय बन ...........
अस्थिर बने रहे ,
मुझे छूकर ,
पीछे धकेल ,
आगे बडते गये पल
और मैं ?
कहीं नहीं थी....................

Monday, August 14, 2006

सपने हैं

पन्नों पर रंगीन सपने लिखे
और .....
उन्हे हवाओं के हवाले कर दिये,
पकड़ ढीली होते ही ....
पन्ने ......................
खिसक खिसक धरा पर गिरते रहे,
और .....
उस जगह को रंगीन सपनों से भरते रहे ! ! !

Friday, June 23, 2006

मन की व्य्यथा

मुझे कविता और चित्रकारी का शौक बचपन से है। कविता लिखीं, प्रकाशित भी हुईं। चित्रों की प्रदर्शनी भी की। एक दिन बात चीत के दौरान, मेरे पति और परिवार वालों ने कहा कि हिन्दी मे चिठ्ठे आना शुरू हो गये हैं, तुम क्यों नहीं लिखतीो। बस इसलिये इसे शुरू कर दिया है। प्रयोग के तौर पर एक कविता और एक चित्र चिठ्ठी मे पोस्ट कर रहीं हूं।

आओ गहन सागर के तट पर बैठे दो पल,
इन ज्वार व भाटों से डरना क्या ।
ये उत्थाल तरंगे तो मानवीय उत्थान पतन सी हैं,
यमुना में परछाई बस ताज भी तो टूटता है,
आओ आज टूट कर भी देख ले दो पल।
कथा बुने, व्यथा सुनें,
आओ आज दो पल।